Maharashtra Muslim Reservation Cancelled: इम्तियाज जलील भड़के, कहा- 'सरकार ने दिया रमजान का तोहफा', गरमाई सियासत
Maharashtra Muslim Reservation News: महाराष्ट्र सरकार ने मुस्लिम आरक्षण का GR रद्द कर दिया है। AIMIM नेता इम्तियाज जलील (Imtiaz Jaleel) ने इसे 'रमजान का तोहफा' बताते हुए सरकार पर नफरत फैलाने का आरोप लगाया। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।
मुस्लिम आरक्षण खत्म: इम्तियाज जलील का तंज- 'सरकार ने हमें दिया रमजान का नायाब
तोहफा', महाराष्ट्र में सियासी उबाल
संभाजीनगर/मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर आरक्षण का मुद्दा गरमा गया है। महायुती सरकार (भाजपा, शिवसेना और एनसीपी) ने एक बड़ा फैसला लेते हुए मुस्लिम समुदाय को शिक्षा और नौकरियों में मिलने वाले 5% आरक्षण (Muslim Reservation) से जुड़े सरकारी आदेश (GR) को आधिकारिक तौर पर रद्द कर दिया है। सरकार के इस फैसले पर एआईएमआईएम (AIMIM) के प्रदेश अध्यक्ष इम्तियाज जलील (Imtiaz Jaleel) ने तीखी प्रतिक्रिया दी है और इसे मुसलमानों के लिए सरकार का "रमजान का तोहफा" करार दिया है।
मंगलवार, 17 फरवरी 2026 को जारी किए गए इस आदेश के बाद राज्य में विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब मुस्लिम समुदाय पवित्र माह रमजान की शुरुआत कर रहा है।
क्या है पूरा मामला? (The Complete Issue)
साल 2014 में तत्कालीन कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने चुनाव से ठीक पहले एक अध्यादेश (Ordinance) जारी किया था। इसके तहत मराठा समुदाय को 16% और मुस्लिम समुदाय को 5% आरक्षण देने का प्रावधान किया गया था। लेकिन बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट ने मराठा आरक्षण और मुस्लिमों को नौकरियों में आरक्षण पर रोक लगा दी थी। हालांकि, कोर्ट ने शिक्षा में मुस्लिमों के लिए 5% आरक्षण को जारी रखने की अनुमति दी थी, यह मानते हुए कि समुदाय शैक्षिक रूप से पिछड़ा है।
अब, 2026 में, मौजूदा सरकार ने उस पुराने 2014 के जीआर (GR) को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। सरकार का तर्क है कि वह अध्यादेश 2014 में ही समाप्त (Lapse) हो गया था क्योंकि उसे कानून में नहीं बदला गया था, इसलिए अब उस जीआर का कोई मतलब नहीं रह गया था।
इम्तियाज जलील का गुस्सा: "यह नफरत की निशानी है"
औरंगाबाद (अब संभाजीनगर) से पूर्व सांसद और एआईएमआईएम नेता इम्तियाज जलील ने सरकार के इस कदम को मुस्लिम विरोधी बताया है। उन्होंने एक वीडियो जारी कर सरकार पर तंज कसा।
"मैं इस सरकार को धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने रमजान के इस पवित्र महीने में मुसलमानों को इतना बेहतरीन 'तोहफा' दिया है," जलील ने व्यंग्य करते हुए कहा।
उन्होंने आगे कहा, "यह फैसला दिखाता है कि आपके (सरकार) दिल में हमारे लिए कितनी नफरत है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी माना था कि मुसलमानों को शिक्षा में आरक्षण मिलना चाहिए, लेकिन आपने वह भी छीन लिया। आप 'सबका साथ, सबका विकास' का नारा देते हैं, लेकिन असल में आप सिर्फ एक समुदाय को पीछे धकेलना चाहते हैं।"
जलील ने मुस्लिम युवाओं से अपील करते हुए कहा, "सरकार हमसे हमारा हक छीन सकती है, लेकिन हमारी कलम नहीं। मैं नौजवानों से कहूंगा पढ़ो, और ज्यादा पढ़ो। शिक्षा ही वह हथियार है जिससे हम इस नफरत का जवाब दे सकते हैं।"
विपक्ष ने घेरा: 'लोकतंत्र के लिए घातक'
सिर्फ एआईएमआईएम ही नहीं, बल्कि कांग्रेस ने भी इस फैसले का कड़ा विरोध किया है। मुंबई कांग्रेस की अध्यक्ष वर्षा गायकवाड़ (Varsha Gaikwad) ने इसे लोकतंत्र के लिए काला दिन बताया।
वर्षा गायकवाड़ ने कहा, "हाईकोर्ट ने शिक्षा में 5% आरक्षण को जायज ठहराया था। सरकार को चाहिए था कि वे इसे कानून बनाकर लागू करते। लेकिन इसके बजाय, उन्होंने पुराने आदेश को ही रद्द कर दिया। यह सरकार संविधान और सामाजिक न्याय की विरोधी है।"
समाजवादी पार्टी के नेता अबू आज़मी ने भी आरोप लगाया कि सरकार अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए हिंदू-मुस्लिम की राजनीति कर रही है और यह फैसला उसी एजेंडे का हिस्सा है।
सरकार की सफाई: 'यह सिर्फ एक औपचारिकता है'
विरोध के बीच, सरकारी अधिकारियों ने सफाई दी है कि इस फैसले का कोई नया कानूनी प्रभाव नहीं है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, "2014 का अध्यादेश 6 महीने के भीतर कानून न बनने के कारण दिसंबर 2014 में ही खत्म हो गया था। सुप्रीम कोर्ट ने भी बाद में इस पर रोक लगा दी थी। इसलिए तकनीकी रूप से यह आरक्षण पिछले 10-12 साल से लागू नहीं था। आज का आदेश सिर्फ उस पुराने कागज को रिकॉर्ड से हटाने की एक प्रशासनिक प्रक्रिया है।"
हालांकि, सवाल यह उठता है कि अगर यह सिर्फ एक "कागजी कार्यवाही" थी, तो इसे ठीक रमजान के मौके पर ही क्यों किया गया?
आगे क्या होगा? (What Next?)
इस फैसले के बाद एआईएमआईएम और अन्य मुस्लिम संगठन राज्य भर में विरोध प्रदर्शन की योजना बना रहे हैं। इम्तियाज जलील ने संकेत दिया है कि वे इस मुद्दे को लेकर जनता के बीच जाएंगे। वहीं, सरकार इसे कानूनी मजबूरी बताकर अपना पल्ला झाड़ रही है।
आगामी स्थानीय निकाय चुनावों को देखते हुए यह मुद्दा और गरमाने के आसार हैं। एक तरफ सरकार अपने वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इसे "मुस्लिम विरोधी मानसिकता" का प्रमाण बताकर भुनाने की तैयारी में है।
निष्कर्ष
महाराष्ट्र में मुस्लिम आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर ठंडे बस्ते में चला गया है, लेकिन इसकी राजनीतिक गूंज दूर तक सुनाई देगी। शिक्षा और नौकरी के अवसरों की तलाश कर रहे मुस्लिम युवाओं के लिए यह खबर निश्चित रूप से निराशाजनक है। अब देखना यह होगा कि क्या कोर्ट या कोई नई सरकार भविष्य में इस "रद्द" किए गए अध्याय को दोबारा खोलती है या नहीं।









