नैतिकता का 'ड्राय डे': गांधी बोतल में, राजस्व के लिए मोहर्रम
महाराष्ट्र सरकार ने गांधी जयंती और मोहर्रम जैसे पवित्र दिनों पर 'ड्राय डे' खत्म कर राजस्व को प्राथमिकता दी है, जिससे नैतिक बहस छिड़ गई है। संभाजीनगर में 'समीर बनाम समीर' की जंग।
महाराष्ट्र में इस वक्त कोई त्योहार या उत्सव नहीं है, चल रहा है तो बस 'राजस्व का मेला'! होली, मोहर्रम और गांधी जयंती जैसे दिनों पर 'ड्राय डे' को इतिहास के पन्नों में धकेल कर सरकार ने सीधा संदेश दिया है तिजोरी भरो, बाकी सब रोको! अब तक इन दिनों शराब की दुकानें बंद रहती थीं, आज सरकार ही कह रही है “शटर खोलो, नोटें गिनो!” अवैध शराब पर लगाम लगाने का बहाना है! मतलब, अब तक जो छिपकर होता था, वह अब सरकारी मुहर के साथ खुलेआम होगा यह कैसी नैतिकता का नया पाठ है?
गांधी जयंती पर पेग — यह किसका महाराष्ट्र?
जिन्होंने जीवन भर शराबबंदी का संदेश दिया, उनकी जयंती पर शराब की छूट! नोट पर गांधी, और उस नोट से गांधी जयंती पर बोतल यह महाराष्ट्र है या राजस्व का बार? गांधी का नाम लेकर राजनीति करने वालों ने आज गांधी के विचारों को ही 'ड्राय डे' दे दिया है। गोडसे से नफरत करने वाले हर नागरिक के घावों पर नमक छिड़कने जैसा नहीं तो क्या?
मोहर्रम के नाम पर राजनीति — मुस्लिम समाज को कुछ फर्क नहीं!
इस्लाम में शराब हराम है यह छोटे बच्चे को भी पता है। इसलिए मोहर्रम पर 'ड्राय डे' हटाया जाए या रखा जाए, मुस्लिम समाज पर इसका कोई असर नहीं होता। तो फिर यह फैसला किसके लिए? जवाब आसान है राजस्व के लिए! धर्म के नाम पर ढोल बजाने वाले आज राजस्व के नाम पर नाच रहे हैं।
पुलिस को 50 मीटर दूर रखो — तिजोरी को सलाम करो!
सरकार का आदेश पुलिस को शराब की दुकानों के पास जाकर यह नहीं पूछना चाहिए कि लाइसेंस है या नहीं, लोग डरते हैं! मतलब, कानून की वर्दी अब राजस्व के लिए 50 मीटर दूर खड़ी रहेगी? यह कानून का सम्मान है या तिजोरी को नमस्कार?
इम्तियाज जलील का जोरदार हमला — ‘शराब की दुकानें शहर से बाहर धकेलो!’
इसी बीच, पूर्व सांसद इम्तियाज जलील ने सीधी चुनौती दी “शराब की दुकानें महानगरपालिका के बाहर ले जाओ!” शराब पीने वालों को शहर से बाहर जाकर पीना चाहिए यह घोषणा शहर बचाने की है या सरकार के राजस्व को आईना दिखाने की? पहली ही आमसभा में प्रस्ताव रखने की चुनौती देकर जलील ने भाजपा की सत्ता को सीधे मुकाबले में उतरने पर मजबूर कर दिया है।
संभाजीनगर में ‘समीर बनाम समीर’ — महासंग्राम तय!
एक तरफ भाजपा के महापौर समीर, दूसरी तरफ एमआईएम के विरोधी दल नेता समीर! अब सवाल महाराष्ट्र को परेशान कर रहा है क्या दोनों समीर एक साथ आकर शहर को शराब मुक्त करेंगे? या एक राजस्व के लिए दौड़ेगा और दूसरा विरोध के लिए? सदन में प्रस्ताव पर मतदान होगा या ‘समीर बनाम समीर’ का मुकाबला जमेगा इस पर पूरे राज्य की निगाहें लगी हैं।
फडणवीस सरकार की भूमिका — तिजोरी या सिद्धांत?
राज्य में भाजपा की सत्ता है, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस हैं। संभाजीनगर महापालिका में भी भाजपा की सत्ता है। तो फिर फैसला क्या होगा? गांधी के विचारों का सम्मान रखेंगे या राजस्व का? यह सिर्फ शराब का सवाल नहीं है यह महाराष्ट्र की नैतिकता, संस्कृति और राजनीति के दोहरे चेहरे का सवाल है। क्या राजस्व के लिए गांधी बेचे जाएंगे? क्या शराब की बोतल से संस्कृति का अंतिम संस्कार होगा? और दो समीर क्या एक ही दिशा में चलेंगे या एक-दूसरे के खिलाफ खड़े होंगे? महाराष्ट्र जवाब का इंतजार कर रहा है… तब तक सरकार ने नैतिकता को 'ड्राय डे' दिया है और तिजोरी को 'फुल बॉटल'!
डॉ. आर. जी. देशमुख, ACP(Rtd), संभाजीनगर (औरंगाबाद)









