राफेल डील फाइनल: ₹3.25 लाख करोड़ का सौदा, तेजस मार्क-2 का भविष्य?
रक्षा मंत्रालय ने 3.25 लाख करोड़ रुपये की 114 राफेल विमानों की खरीद को मंजूरी दे दी है. यह देश का सबसे बड़ा रक्षा सौदा है. जानिए इसका देसी फाइटर तेजस मार्क-2 पर क्या असर होगा।
भारत के रक्षा इतिहास का सबसे बड़ा सौदा आखिरकार मंज़ूर हो गया है। गुरुवार को रक्षा मंत्रालय की रक्षा खरीद परिषद (DAC) ने फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद को हरी झंडी दे दी। यह मेगा डील लगभग 3.25 लाख करोड़ रुपये की होगी, जो भारतीय सेना की हवाई ताकत को अभूतपूर्व बढ़ावा देगी।
भारत के सबसे बड़े रक्षा सौदे की अहमियत
राफेल (Rafale) पहले से ही भारतीय वायु सेना का एक अभिन्न अंग है, और इस नए अधिग्रहण से वायुसेना के बेड़े में 114 अतिरिक्त 4.5वीं पीढ़ी के मल्टी रोल फाइटर जेट्स शामिल हो जाएंगे। यह सौदा न केवल हवाई युद्ध क्षमता को मजबूत करेगा, बल्कि रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। इस डील के साथ ही अमेरिका से छह अतिरिक्त पी-8आई टोही विमानों की खरीद को भी मंजूरी दी गई, जिसकी अनुमानित लागत 30 हजार करोड़ रुपये है। हालांकि, देश की निगाहें ₹3.25 लाख करोड़ के राफेल सौदे पर टिकी हैं, जो भारत के इतिहास का सबसे महंगा रक्षा अधिग्रहण है।
राफेल की एंट्री, तेजस मार्क-2 का भविष्य?
जहां एक ओर सरकार विदेशी फाइटर जेट्स पर रिकॉर्ड तोड़ खर्च कर रही है, वहीं दूसरी ओर सवाल उठ रहे हैं कि भारत के स्वदेशी 4.5वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान, तेजस मार्क-2 (Tejas Mark-2), का क्या होगा? तेजस मार्क-2 को भारतीय वायुसेना की मध्य-भार श्रेणी (Medium Weight) की जरूरतों को पूरा करने के लिए डिज़ाइन किया गया है और इसे 'आत्मनिर्भर भारत' पहल का एक प्रमुख स्तंभ माना जाता है।
क्या दोनों की जरूरत है?
रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि भारतीय वायु सेना (IAF) को अपनी बढ़ती रणनीतिक और संख्यात्मक जरूरतों को पूरा करने के लिए राफेल और तेजस मार्क-2 दोनों की आवश्यकता है। राफेल एक सिद्ध, युद्ध-तैयार मंच है जो तुरंत बेड़े की कमी को पूरा कर सकता है। वहीं, तेजस मार्क-2, जिसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) द्वारा विकसित किया जा रहा है, भारत को लंबे समय में लड़ाकू विमान प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भर बनाएगा।
तेजस मार्क-2 का विकास कार्य फिलहाल जोरों पर है और इसके 2025-26 तक अपनी पहली उड़ान भरने की उम्मीद है। हालांकि, राफेल जैसे बड़े विदेशी सौदे अक्सर घरेलू परियोजनाओं के वित्त पोषण और उत्पादन गति को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि स्वदेशीकरण उनकी प्राथमिकता है, लेकिन तात्कालिक सुरक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ऐसे बड़े विदेशी सौदे आवश्यक हो जाते हैं।
आत्मनिर्भरता की राह और राफेल की भूमिका
यह देखना दिलचस्प होगा कि इतनी बड़ी विदेशी खरीद के बावजूद, सरकार तेजस मार्क-2 परियोजना को कैसे प्राथमिकता देती है। राफेल सौदे में बड़ा हिस्सा मेक-इन-इंडिया कंपोनेंट (Offset obligations) के रूप में भारत में वापस आने की उम्मीद है, जिससे भारतीय रक्षा उद्योग को भी लाभ मिलेगा। लेकिन असली जीत तभी होगी जब स्वदेशी तेजस मार्क-2 भारतीय वायु सेना के बेड़े की रीढ़ बने और भारत लड़ाकू विमानों का एक विश्वसनीय निर्यातक बने।









