'आश्रम है, शिष्य नहीं': राजीव शुक्ला का 'विश्वगुरु' दावे पर तंज
कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला ने राज्यसभा में सरकार के 'विश्वगुरु' वाले दावे पर कटाक्ष किया है। उन्होंने कहा कि भारत ने आश्रम खोल लिया, पर शिष्य नहीं हैं। यह टिप्पणी विदेश नीति की समीक्षा के संदर्भ में आई है।
नई दिल्ली। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद राजीव शुक्ला ने केंद्र सरकार द्वारा भारत को 'विश्वगुरु' (World Teacher) के रूप में पेश करने के दावे पर तीखा तंज कसा है। संसद के उच्च सदन (राज्यसभा) में बोलते हुए, शुक्ला ने सरकार की नीतियों की समीक्षा की और सवाल उठाया कि केवल नारों से नहीं, बल्कि ठोस वैश्विक प्रभाव से ही हम विश्वगुरु बन सकते हैं।
राजीव शुक्ला का व्यंग्य: 'आश्रम तो है, शिष्य कहाँ?'
राजीव शुक्ला की टिप्पणी बेहद व्यंग्यात्मक थी, जिसने सरकार के इस दावे की नींव पर ही सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा, "हम कैसे विश्वगुरु हैं? यह स्थिति ऐसी है कि गुरु ने आश्रम तो खोल लिया है, लेकिन शिक्षा ग्रहण करने के लिए कोई शिष्य (अनुयायी) ही नहीं है।"
कांग्रेस सांसद की यह टिप्पणी भारत की विदेश नीति और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की वर्तमान स्थिति पर सीधा निशाना थी। उनका मानना है कि यदि भारत वास्तव में वैश्विक नेता या 'विश्वगुरु' है, तो उसे अपनी नीतियों और प्रभाव के माध्यम से अधिक देशों को नेतृत्व प्रदान करने और उन्हें आकर्षित करने की आवश्यकता है। उनका इशारा इस ओर था कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रभाव उतना गहरा नहीं है जितना दावा किया जा रहा है।
विदेश नीति पर सवाल
यह बयान ऐसे समय में आया है जब सरकार लगातार अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत की बढ़ती साख और प्रभाव का दावा करती रही है। राजीव शुक्ला ने इस बात पर जोर दिया कि वैश्विक नेतृत्व सिर्फ बड़े आयोजनों या दावों से नहीं, बल्कि अन्य देशों के बीच भारत के प्रति विश्वास और अनुयायियों की संख्या से मापा जाता है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व पत्रकार होने के नाते राजीव शुक्ला लगातार सरकार की नीतियों पर मुखर प्रतिक्रिया देते रहे हैं। उनका यह बयान भारत की वर्तमान वैश्विक स्थिति पर एक गंभीर राजनीतिक समीक्षा प्रस्तुत करता है, जिसका उद्देश्य सरकार के 'विश्वगुरु' वाले महत्वाकांक्षी लेकिन अपुष्ट दावे की जांच करना है।









