"आजादी का संघर्ष धर्मनिरपेक्ष था: भारत की आजादी में मुसलमानों की भूमिका".

"आजादी का संघर्ष धर्मनिरपेक्ष था: भारत की आजादी में मुसलमानों की भूमिका".

"इंकलाब ज़िंदाबाद" से संविधान तक: आधुनिक भारत में मुसलमानों का योगदान."भारत हम सब ने मिलकर बनाया है": आजादी की लड़ाई में मुसलमानों के योगदान को याद करते हुए.इतिहास गवाह है कि मुसलमानों ने तिरंगे के लिए कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ी।

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सवाल और जवाब:

"भारतीय मुसलमानों ने इस देश के लिए क्या किया है?"  यह सवाल इतिहास को नकारता है।

1857 से 1947 तक, भारतीय मुसलमानों ने लड़ाई लड़ी, कुर्बानी दी, जेल गए और उसी तिरंगे के लिए अपनी जान दी जिसके लिए हर दूसरे भारतीय ने दी। देशभक्ति कभी भी धर्म से नहीं जुड़ी थी और न कभी जुड़ सकती है।

आजादी की लड़ाई में मुसलमान:

आजादी का आंदोलन हर धर्म के लोगों ने मिलकर बनाया। मुस्लिम नेताओं और क्रांतिकारियों की केंद्रीय भूमिका रही:

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद– स्वतंत्रता सेनानी, विद्वान, भारत के पहले शिक्षा मंत्री। आधुनिक भारत की शिक्षा व्यवस्था के निर्माता।

अशफाकउल्ला खान – काकोरी ट्रेन एक्शन के क्रांतिकारी। 19 साल की उम्र में अंग्रेजों से लड़ते हुए फांसी पर चढ़ गए।

-हसरत मोहानी – कवि और स्वतंत्रता सेनानी जिन्होंने "इंकलाब ज़िंदाबाद" का नारा दिया। 1921 में ही पूर्ण स्वराज की मांग की।

सैयद आगा हैदर – क्रांतिकारी जिन्होंने HSRA में भगत सिंह के साथ लड़ाई लड़ी।

हजारों और – 1857 की क्रांति में बहादुर शाह ज़फ़र से लेकर खिलाफत, असहयोग और भारत छोड़ो आंदोलन तक, मुसलमान जेल गए, शहीद हुए और देश के लिए निर्वासित हुए।

आजादी के बाद:

1947 के बाद भी मुसलमानों ने आधुनिक भारत के निर्माण में योगदान दिया:  संविधान में, सेना में, विज्ञान, कला, खेल और लोक सेवा में। एकता में विविधता और धर्मनिरपेक्षता का विचार हमारे संविधान में इसी लिए लिखा गया क्योंकि भारत हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी, नास्तिक और सभी समुदायों का है।

यह आज क्यों जरूरी है:

किसी भी भारतीय को अपने धर्म के कारण देशभक्ति साबित करने की जरूरत नहीं है। "तुमने क्या किया" पूछना उन कुर्बानियों को मिटा देता है और भारत के उस विचार को कमजोर करता है कि हम एक राष्ट्र हैं जो कई समुदायों से मजबूत बना है।

3 स्वतंत्रता सेनानी, 3 कहानियां:

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद: "हम पहले भारतीय हैं, आखिर में भी भारतीय।"

अशफाकउल्ला खान: "सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है।" 

मौलाना हसरत मोहानी: "इंकलाब ज़िंदाबाद" का नारा देने वाले। 1921 में पूर्ण स्वाधीनता की मांग।

महत्वपूर्ण बात: 

आजादी की लड़ाई में हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, दलित, आदिवासी - सब साथ थे।

                                                एर. एम. ए. शकील,

                                                                  एम.डी.

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